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'बारिश'

"बारिश की पहली बूंदों से, जब याद तुम्हारी आती है, 
मिट्टी की भीनी खुशबू तब, तन की मिट्टी में धंस जाती है।

 

आंखें मूंदे जब बूंदों से, भीग जाएगा तन सारा,

गीले गालों को छूकर, तब याद तुम्हारी आती है।

 

हाथों से छूकर जब वो बूंदें, मिट्टी पर धंस जाती है,
मिट्टी सी वो तन की खुशबू, तब याद तुम्हारी आती है।

 

होठों को रसती सी बूंदें, सीने तक ढल जाती है,
पलको में बूंदों को भींचे, तब याद तुम्हारी आती है।

 

खिलती है यौवन की बूंदें, जब सारी बातें चुक जाती है,
फिर स्याही की बूंदे रिसकर, फिर याद तुम्हारी आती है।"


~ Alfaaz 'अल्फाज़'

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