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देशभक्ति कोई पाठ नहीं एक परवरिश

 

"तकरीबन एक साल बाद सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले पर संशय में लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि केंद्र सरकार खुद इस मामले में फैसला करे, हर काम कोर्ट पर नहीं थोपा जा सकता।
मैं सुप्रीम कोर्ट का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन अपने फैसलों पर अडिग रहने की भी आशा भी करता हूं।
कोर्ट ने बिल्कुल सही कहा कि केंद्र सरकार का हर काम कोर्ट पर नहीं थोपा जा सकता। तो फिर रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा तो केंद्र सरकर का है, उसमे सुप्रीम कोर्ट का ज़बरदस्ती टांग अड़ाना क्यों? राष्ट्रीय सुरक्षा में सुप्रीम कोर्ट कोई दखल नहीं दे सकता ये बात सुप्रीम कोर्ट को विदित होनी चाहिए।
आपने दीवाली पर पटाखों की बिक्री पर तो रोक लगा दी लेकिन पटाखे फोड़ने पर कोई पाबंदी नहीं। अगर हम सिर्फ पटाखे फोड़ने पर ही पाबंदी लगते तो शायद परिणाम बेहतर होते। 
अगर किसी देश को देशभक्ति वहां के उच्चतम न्यायालय को सिखानी पड़े तब ऐसे हालात में तो उस देश की जनता की मानसिकता ही शक के दायरे में रखी जानी चाहिए।
कोर्ट के पास गंभीर एवं राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों का अंबार लगा हुआ है। 
आप कुलभूषण जाधव के मुद्दे पर सरकार से कोई सवाल जवाब नहीं करते? 
केंद्र सरकार कैप्टन सौरभ कालिया का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में आज तक ठोस सबूतों के साथ क्यों नहीं रख पायी?
जहां एक व्यक्ति 20 साल जेल में काटने के बाद निर्दोष साबित होता है, उस न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए आप कोई कदम क्यों नहीं उठाते हो?
देश के बड़े और गंभीर मुद्दे छोड़कर सुप्रीम कोर्ट का अपना कीमती समय बेवजह के मुद्दों पर व्यर्थ करना कोई तर्कसंगत नहीं है।
मेरा मानना तो सिर्फ यही है कि देशभक्ति आपकी परवरिश का नतीजा होती है। आप ज़बरदस्ती न तो प्यार जागृत कर सकते हैं और न ही देशभक्ति।"
~व्यक्तिगत विचार।
जय हिन्द, जय भारत।
#DilToFaujiHaiJi

 

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