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अमेरिका का H-1B वीजा नियम- कितना जायज!

 

H1-B वीजा (immigrant worker visa) एक तरह की तत्काल सेवा है जिसके अंतर्गत 1225 डॉलर की फीस देकर 15 दिन के भीतर अमरीका के लिए वीज़ा मिल जाता है, जबकि इस पर औसतन 3 से 6 महीने तक का वक़्त लगता है। अमेरिका ने 3 अप्रैल के बाद इस तत्काल सेवा पर रोक लगा दी है। इस वीज़ा के तहत हर साल 85,000 पेशेवर को वीजा दिया जाता है जिसमें लगभग 75% भारतीय इसका फायदा उठाते हैं। अनुमानित तौर पर तीन लाख भारतीय एच-1बी वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं।

अमेरिकी सरकार ने डोनल्ड ट्रम्प की आदेश के बाद H-1B वीजा नियम को सख्त करने के लिए कई मसौदे तैयार किये हैं। हम इस वीजा नियम के दोनों पहलुओं (सकारात्मक एवं नकारात्मक) पर नज़र डालेंगे और फिर आप खुद तय कर सकेंगे कि यह नियम किस हद तक कारगर या किस हद तक सही है।

 

पहलू-१ 
  • पहला सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू है अमेरिका के नवयुकों की बेरोजगारी।
    संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की IT इकाईयां (कंपनियां) एक बहुत बड़े पैमाने पर प्रगतिशील (developing) देशों के स्नातक (graduate) लोगों को नौकरी दे रही है, क्योंकि ये लोग अमेरिकी लोगों के मुकाबले कम तनख्वाह में भी काम करने को तैयार हो जाते है। यही कारण है कि अमेरिका का प्रतिभावान व्यक्ति बेरोजगार होता जा रहा है और ये सभी नौकरियां उन दूसरे देशों के लोगों के हाथ में चली जाती है जो कम तनख्वाह पर भी काम करने को तैयार हो जाते है।

     

  • H-1B धारक कर्मचारी कम वेतन पाते है और कभी न कभी अभद्रता का शिकार भी होते है। जैसा कि इन्हें कम वेतन मिलता है, यही कारण है कि इनके साथ सस्ते मजदूर जैसा बर्ताव होता है।
     

  • वर्तान में, छोटी इकाइयां (company) और नए व्यवसाय के पास वीजा प्रायोजक (sponsor) करने का कोई मौका नहीं था, वहीं इस बिल के साथ वर्ष में 20% H-1B वीजा इनके लिए आरक्षित किया जाएगा।
     

  • अमेरिका में आईटी इकाइयां (company) भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव करती हैं क्योंकि ये छात्र कम वेतन पर काम करने के लिए तैयार नहीं होते। हाल में पेश किया गया बिल विदेशी कर्मचारियों को नौकरी के बजाय विदेशी छात्रों पर ज्यादा जोर देता है।

पहलू-२
  • अमेरिकी अर्थव्यवस्था कुशल एवं निपुण विदेशी कर्मचारियों से बहुत लाभ में हैं जिस कारण इस वक़्त विदेशी लोगों के लिए दरवाजे बंद करना सही नहीं है।
     

  • न्यूनतम दैनिक आय कानून के चलते आईटी इकाइयों के खर्चे बढ़ जायेंगे।
     

  • अमेरिका का आईटी उद्योग कुशल कर्मचारी की कमी से जूझने लगेगा।
     

  • इस फैसले के बाद अमेरिका के कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबध खराब हो सकते है जिनमे से भारत एक हो सकता है।
     

  • आज के वैश्वीकरण (globalization) युग में प्राथमिकता राष्ट्रीयता के आधार पर न देकर कुशलता के आधार पर देनी चाहिए।
     

  • अमेरिका प्रवासियों की धरती है। पहले से बसे हुए प्रवासियों का नए प्रवासियों का विरोध करना बिल्कुल भी जायज नहीं है।
     

  • अधिकतर H-1B वीजा धारक कुछ वर्षों तक अमेरिका में काम करने के बाद स्वदेश वापस लौट जाते है जिसके कारण वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं देते।

 

 

निष्कर्ष: हालांकि डोनल्ड ट्रम्प की रणनीतियां सवालों के घेरे में आती रही है, लेकिन ये हर देश का अधिकार है की वह अपने राष्ट्रहितों की रक्षा करे। जिस तरह हम लोग चीनी सामान का विरोध कर रहें हैं उसी तरह अमेरिकी नागरिक भी अपनी नौकरियां बचाने के लिए विदेशी लोगों का विरोध कर रहे हैं। H-1B वीजा नियम को कठोर बनाना समझ आता है लेकिन अगर हम लम्बे समय की बात करें तो ये भारतीय अर्थव्यवस्था से ज्यादा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पंहुचा सकता है क्योंकि ऐसा हो सकता है कि अमेरिकी आईटी इकाइयां अपने कारोबार को अमेरिका की बजाय किसी और देश में स्थापित कर दें। इसका परिणाम अमेरिका में भारी बेरोजगारी के रूप में देखा जाएगा।

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