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आईएनएस (INS) कलवरी-मेरी नज़र से

 17 साल के लम्बे इंतज़ार के बाद आखिरकार 14 दिसम्बर 2017 को भारत में नौसेना बेड़े में आईएनएस कलवरी को शामिल कर लिया गया है। इसे सीधे तौर पर भारतीय नौसेना की बड़ी कामयाबी के साथ-साथ दुनिया में अपनी ताक़त का लोहा मनवाने के तौर पर देखा जा रहा है। 1,564 टन के इस सबमरीन को प्रॉजेक्ट-75 के अंतर्गत बनाया गया है जो पाकिस्तान के साथ साथ चीनी घुसपैठ का भी मुहतोड़ जवाब देने में सक्षम है।

आगे इस लेख में हम कुछ ऐसी हैरान कर देने वाली बातें जानेगे जो आईएनएस कलवरी को दुनिया की सबसे अलग पनडुब्बी बनती है।

 

  • देश की पहली पनडुब्बी का नाम भी 'कलवरी' ही था। पहली कलवरी आठ दिसंबर 1967 को नौसेना में शामिल की गई थी। करीब 30 सालों तक देश को अपनी सेवा देने के बाद इसने 31 मई 1996 को अपना काम बंद किया।
     

  • मेक इन इंडिया के तहत बनायी गयी यह पनडुब्बी पूर्णतः स्वदेशी है जिसे फ्रांस की मदद से बनाया जा रहा था।
     

  • इस पनडुब्बी का नाम हिंद महासागर में गहरे पानी में पाई जाने वाली खतरनाक 'टाइगर शार्क पर कलवरी रखा गया है।
     

  • INS कलवरी के निर्माण में लगभग 12 लाख लोग लगे हैं।
     

  • इस स्कोर्पियन क्लास की पनडुब्बी का डिजाइन फ्रांसीसी नौसेना रक्षा एवं ऊर्जा कंपनी डीसीएनएस ने तैयार किया है। इसका निर्माण भारतीय नौसेना के 'प्रोजेक्ट-75 के तहत मुंबई स्थित मझगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल) में किया गया।
     

  • 20 नॉट्स (1 नॉट्स = 1.852 किमी) की स्पीड वाला सबमरीन SM-39 Exocet ऐंटी-शिप मिसाइल और टॉरपीडो से लैस है।
     

  • आईएनएस कलवरी की मारक क्षमता ऐसी है कि यह टॉरपीडो की मदद से दुश्मन की ओर से आने वाले गाइडेड वेपेंस पर तुरंत हमला कर सकती है। इसके अलावा पनडुब्बी के अंदर होने पर इसे ट्यूब की मदद से एंटी-शिप मिसाइल को भी इससे दागा जा सकता है।
     

  • माइन बिछाने, क्षेत्र निगरानी, विरोधी-पनडुब्बी युद्ध, खुफिया जानकारी और बहुविध युद्ध गतिविधियों सहित इस गुप्तता वाली पनडुब्बी के माध्यम से कई रक्षा गतिविधियों का संचालन किया जा सकता है।
     

  • कलवारी को विशेष इस्पात से बनाया जा रहा है और यह उच्च उपज तनाव का सामना कर सकता है क्योंकि इसमे तन्यता ताकत है, इसके अलावा यह उच्च तीव्रता के हाइड्रोस्टाटिक बल का सामना कर सकती है और महासागरों में गहराई से गोता लगा सकती है।
     

  • आईएनएस कलवारी और इस श्रेणी में अन्य पनडुब्बियाँ को भी हथियार लॉन्चिंग ट्यूबों के साथ सुसज्जित हैं और यह अपने साथ बोर्ड पर हथियार ले सकते हैं जो प्रभावी रूप से समुद्र में पुनः लोड हो सकते हैं।
     

  • पनडुब्बी 6 x 533 मिमी टॉर्पेडो ट्यूबों से लैस है जिसमे 18 व्हाइटहेड एलनिया सुस्तमी सुबैक्की ब्लैक शार्क हेवीवेट टॉर्पेडोज या एसएम.39 एक्सॉकेट एंटी शिप मिसाइल लोड की जा सकती है।
     

  • कलवरी को केवल एमबीडीए की ट्यूब-लॉन्च एक्सोकेट एसएम-39 एंटी शिप मिसाइलों के साथ हथियारों से लैस किया गया है।
     

  • स्टील्थ तकनीक के कारण यह चकमा देकर दुश्मन पर गाइडेड हथियारों से हमला करने में भी सक्षम है।
     

  • डीजल-इलेक्ट्रिक दोनों ही तरह ताकत से लैस इस पनडुब्बी के आने के बाद से नौसेना के बाद कुल पनडुब्बियों की संख्या 14 हो जाएगी।
     

  • हिंद महासागर में बढ़ती चीनी गतिविधियों के मद्देनजर अभी नौसेना को 24 से लेकर 26 पनडुब्बियों की जरूरत होगी।



    अगली ज़रूरतें:

  • चीन और पाकिस्तान से सतर्क रहते हुए और इन देशों से लोहा लेने के लिए भारत को कम से कम 18 डीजल-इलेक्ट्रिक और 6 परमाणु न्यूक्लियर अटैक सबमरीन्स की जरूरत है।
     

  • इस समय भारत के बेड़े में 13 डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन हैं, जो 17 से 32 साल पुराने हैं। हालांकि इनमें से केवल 7 या 8 ही एक समय पर ऑपरेशनल रहते हैं।
     

  • भारत के पास 1 परमाणु ऊर्जा से संचालित बलिस्टिक मिसाइल सबमरीन INS अरिहंत है, जो 750 किमी तक परमाणु मिसाइलें छोड़ सकता है।
     

  • एक ऐसी परमाणु संचालित अटैक सबमरीन INS चक्र भी भारत के पास है, जो नॉन-न्यूक्लियर क्रूज मिसाइलों से लैस है।
     

  • चीन, पाक और अमेरिका के पास - चीन के पास 56 सबमरीन हैं। इनमें से 5 JIN श्रेणी की परमाणु ऊर्जा से संचालित सबमरीन है, जो परमाणु बलिस्टिक मिसाइल से लैस है। इस पर लैस JL-2 मिसाइलें 7400 किमी तक मार कर सकती हैं।
     

  • उधर, पाकिस्तान के पास 5 डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन हैं जबकि उसे चीन से 8 और सबमरीन मिलने वाले हैं।
     

  • अमेरिका के पास 72 न्यूक्लियर सबमरीन है। रूस के पास 40 से ज्यादा, यूके व फ्रांस के पास 8-12 सबमरीन है।

~ कुलदीप शर्मा 

 

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