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सरफरोशी की तमन्ना... का इतिहास

जब-जब काकोरी कांड की बात आती है, तब-तब स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल का नाम तुरंत जहन में आ जाता है। और इसी कांड के सिलसिले में आज के दिन यानी 19 दिसम्बर 1927 को अंग्रेजी हुकूमत ने रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर की जेल में सुबह 8 बजे फाँसी दे दी। बिस्मिल के साथ ही अशफ़ाक को फैजाबाद जेल में और रोशन सिंह को इलाहबाद के नैनी जेल में फाँसी दी गयी।
इसी मौके पर राम प्रसाद बिस्मिल की लोकप्रिय रचना 'सरफरोशी की तम्मना' के इतिहास से जुडी एक कड़ी आपके साथ सांझा की जा रही है।

एक दिन स्वतंत्रता सेनानी अशफाक उल्ला खां आर्य समाज मन्दिर शाहजहाँपुर में बिस्मिल के पास किसी काम से गये। अशफाक उस वक्त शायराना मूड में थे और अचानक जिगर मुरादाबादी की चंद लाइनें गुनगुनाने लगे। लाइनें थीं-

"कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है।
जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।"

बिस्मिल सुन कर मुस्कुरा दिये। अशफाक को अटपटा लगा और कहा, "क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?" बिस्मिल ने जबाब दिया- "नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूं मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बडा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।"

उस वक्त अशफाक को कुछ अच्छा नहीं लगा और चुनौती भरे अंदाज में कहा, "तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।" बिना कुछ बोले राम प्रसाद बिस्मिल' ने कहा-

"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजु-कातिल में है?"

यह सुनते ही अशफाक भावविभोर हो गये और बिस्मिल को गले लगा लिया। फिर बोले - "राम भाई! मान गये; आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।"

बहुत कम लोग जानते हैं कि राम प्रसाद बिस्मिल तीन नामों से किताबें लिखते थे। राम, अज्ञात और बिस्मिल। बिस्मिल नाम ही सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।

रामप्रसाद बिस्मिल की देश भक्ति कविता के कुछ अंश

“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है!

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ! हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है!

खींच कर लाई है हमको क़त्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूच-ए-क़ातिल में है!

ऐ शहीदे-मुल्के-मिल्लत हम तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है!

अब न अगले बल्वले हैं और न अरमानों की भीड़, सिर्फ मिट जाने की हसरत अब दिले-'बिस्मिल' में है!”

जय हिन्द, जय भारत

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