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पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) की अनकही बातें दस्तावेजों के साथ।

आप में से कई लोग ये जानते होंगे कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र होने की कगार पर था उस समय भारत में कुल 565 रियासतें (राज्य) थी। और यह भी स्पष्ट होगा कि भारत के स्वतंत्र होने से ठीक एक दिन पहले 14 अगस्त 1947 पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान की मांग राखी गयी उस समय के एक मुस्लिम नेता मोहम्मद अली जिन्नाह द्वारा, जिन्होंने भारत से एक अलग राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ की मांग उठाई और जिसका समर्थन तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य ने भी बखूबी किया।

अंग्रेजों की कूटनीति की हद यह थी कि वह भारत को एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्र नहीं करना चाहते थे अपितु भारत को 565 छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बाटने की साजिश रच रहे थे। यही कारण था कि अंग्रेजों ने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ में ये प्रावधान डाला था कि भारत की रियासतें चाहे तो भारत में विलय कर सकती है, पाकिस्तान में विलय कर सकतीं हैं और अगर चाहे तो अपना अलग स्वतंत्र राष्ट्र भी बना सकती हैं। अंग्रेजों के इस प्रस्ताव के पीछे एक नियत तो साफ़ थी और वो यह कि अँग्रेज़ बिलकुल भी नहीं चाहते थे कि भारत एक संयुक्त राष्ट्र बने, अपितु अंग्रेज़ी सरकार तो इस बात पर अमादा थी कि भारत के 565 छोटे-छोटे टुकड़े हो जायें। उस समय ब्रिटिश सरकार का वाइस-रॉय था माउंट बैटन। माउंट बैटन ने बहुत से प्रमुख राज्यों से ये कहा था की अगर आप भारत से अलग होने का संकल्प लेंगे तो हम आपको स्वतंत्र राष्ट्र बनने में मदद करेंगे।

माउंट बैटन के इस प्रस्ताव पर विचार करने के बाद कई राज्य भारत से स्वतंत्र होने के लिए राज़ी भी हो गए। उन दिनों हैदराबाद का प्रमुख निजाम था, उसने कहा कि हम लोग पाकिस्तान में विलय करेंगे, भोपाल, जूनागढ़ जैसे राज्य भी पाकिस्तान में जाने को तैयार हो गए।

जब नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल को अंग्रेजों की इस नीति का पता लगा तब उन्होंने अंग्रेजों की इस नीति को चुनौती देने के लिए एक दूसरी योजना के तहत काम किया। उनकी इस योजना के अनुसार अंग्रेजों की सरकार जिस दिन तक ये कानून लागू करे उस दिन तक ज्यादा से ज्यादा राज्य और रियासतें भारत में शामिल हो जायें और उनके समझौते भारत सरकार के साथ हो जायें। सरदार पटेल ने 565 राज्यों में से कुछ के पास अपना दूत भेजा और कुछ राज्यों के पास स्वयं भी गये। सरदार पटेल ने तमाम रियासतों को भारत में रहने के लाभ और भारत से अलग होने की हानियाँ बताई। फलस्वरूप जब सरदार पटेल ने सभी रियासतों से बात करना शुरू किया तब कई राज्यों ने भारत में मिलने का संकल्प किया और विलय संधि पर हस्ताक्षर कर दिये।
हालांकि सरदार पटेल के अथक प्रयासों के बाद भी कई राज्य ऐसे भी हुए जिन्होंने ये फैसला किया था कि वे ना तो भारत में जायेंगे और ना पाकिस्तान में, वे अपने आप को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने पर अमादा थे। ऐसे चार राज्य थे और वो थे कोयम्बटूर, त्रावनकोर, हैदराबाद और जूनागढ़। जब ये चार राज्य भारत में मिलने को तैयार नहीं हुए तब वल्लभ भाई पटेल ने इन राज्यों में सेना भेजी और जल्द ही ये चारों राज्यों ने समर्पण करने के बाद भारत में मिलने की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए।

ऐसा ही एक राज्य और था और वो था जम्मू कश्मीर। उन दिनों वहां का राजा था हरी सिंह। राजा सिंह का संकल्प था कि न तो मैं पाकिस्तान में जाऊँगा और न ही भारत में। हरी सिंह अपने स्वतंत्र राष्ट्र के संकल्प पर अडिग रहा। वहीं आजादी के बाद जिन्नाह ने जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में विलय करने की कोशिश की लेकिन वहां का राजा और नागरिक पाकिस्तान में जाने को तैयार नहीं थे। विभाजन के वक़्त जिन्नाह का पहला उद्देश्य यही था कि उसे कश्मीर चाहिए और ब्रिटिश सरकार भी यही चाहती थी की जिन्नाह को कश्मीर मिले। लेकिन सरदार पटेल ने जम्मू कश्मीर के राजा को ये चेतावनी दी थी कि अगर वो स्वतंत्र राष्ट्र बना तो या पाकिस्तान उसे अपने मुल्क में जबरदस्ती मिला लेगा या भारत उसे अपने राज्य में विलय कर लेगा। उस समय वहां के राजा ने सरदार पटेल की बात अनसुनी कर दी थी जिसका परिणाम उसे निकट भविष्य में भुगतना पड़ा।

जिन्नाह ने 20 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया और तीन दिनों के अन्दर ही यानी 23 अक्टूबर तक जम्मू-कश्मीर की सेना ने पाकिस्तानी हमलावरों के आगे घुटने टेक दिए थे। पाकिस्तानी सेना जल्द ही श्रीनगर के नजदीक पहुँच गयी थी। तीन दिन बाद यानी 24 अक्तूबर को महाराजा हरि सिंह को यह बखूबी एहसास हो गया था कि अगर पाकिस्तान को नहीं रोका गया तो जल्द ही जम्मू कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाएगा। अब महाराजा हरी सिंह के सामने एकमात्र रास्ता बचा था और वो था भारतीय फ़ौज की मदद लेना। महाराजा हरी सिंह को जब बाजी हाथ से निकलती प्रतीत हुई तब उन्होंने अपना एक मंत्री को सरदार पटेल से मिलने भारत भेजा। महाराजा हरी सिंह के मंत्री की मुलाकात जब सरदार पटेल से हुई तब सरदार पटेल ने यह कहकर सेना भेजने से इनकार कर दिया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अंग नहीं है जिस कारण वह जम्मू-कश्मीर की कोई मदद नहीं कर सकते।

सरदार पटेल के मना करने के बाद राजा हरी सिंह ने सरदार पटेल से पूछा कि आप अपनी शर्त बताइए, तब सरदार पटेल ने कहा कि भारतीय सेना तभी जम्मू कश्मीर में आ सकती है जब यह राज्य भारत का अंग होगा। इस बात पर महाराजा हरी सिंह सहमत हो गए और विलय करने को तैयार हो गए।

जम्मू कश्मीर को भारत में विलय करने के लिए कागजात तैयार किये गए और 26 अक्तूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर भारत राष्ट्र का अभिन्न अंग हो गया। इस संधि के दस्तावेज आज भी भारत सरकार के पास मौजूद है।

 

 

अटैचमेंट में जो फोटो है उसकी साफ़-साफ़ लिखावट आप इस वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं। http://www.jammu-kashmir.com/documents/instrument_of_accession.html 

महाराजा हरि सिंह ने समझौता ये किया कि भारत सरकार की सेनाएं हमारी यानी जम्मू कश्मीर की पाकिस्तान से रक्षा करेगी, बदले में हम पूरा का पूरा राज्य भारत में विलय करने की बात करते हैं। उस संधि में एक ही बात मुश्किल हो गयी कि महाराजा हरि सिंह ने कहा कि "हम विलय जरूर करेंगे भारत में लेकिन हमारा स्वतंत्र अस्तित्व खतरे में नहीं पड़ना चाहिए। हम जम्मू कश्मीर के रहने वाले लोगों का एक स्वतंत्र अस्तित्व है, हमारी अलग अस्मिता है, हमारी अलग संस्कृति है, हमारी अलग भाषा है, हमारा अलग खान-पान है, हमारा अलग रहन-सहन है। हमारी पूरी पहचान को कोई खतरा ना हो तो कुछ शर्तों के साथ हम विलय करने को तैयार हैं। तो शर्तें कुछ इस तरह की थी कि जम्मू कश्मीर को एक विशेष राज्य का  दर्जा मिलेगा और वो विशेष राज्य का दर्जा हमको हमारे संविधान में लाना पड़ेगा। इन सभी शर्तों के साथ जम्मू कश्मीर का विलय भारत में हुआ। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा भारत के संविधान की धारा 370 में दिया गया है।

सरदार पटेल ने सेना को 27 अक्तूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर भेजा, जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना ये युद्ध करना शुरू किया तब पाकिस्तानी सेना पीछे तो हटी लेकिन युद्ध जारी रहा।

चूंकि इस वक़्त घाटी में बर्फ़बारी ज्यादा होने के कारण यह युद्ध बिल्कुल भी आसान नहीं था, यह युद्ध 27 अक्तूबर 1947 से लेकर जनवरी 1948 तक (कुल तीन महीने) लगातार युद्ध जारी रहा। जब पाकिस्तानी सेना को लगा की अब भारत से नहीं जीत सकते तब लगभग तीन महीने बाद पाकिस्तानी सेना ने अपनी हार स्वीकार की और पीछे हटना शुरू किया। पीछे हटते हुए पाकिस्तानी सेना ने कूटनीतिक तरीका अपनाना शुरू किया। यह कूटनीतिक प्रयास ये था कि जम्मू कश्मीर पर तो अब हम कब्ज़ा कर नहीं सकते लिहाजा जितना इलाका हमारे हाथ लगा है उसी को बचा कर निकल लिया जाए तो ठीक होगा।

तभी उस समय पाकिस्तानी सरकार ने भारत सरकार से शान्ति स्थापना की बात की जिस पर सरदार वल्लभ भाईपटेल सहमत नहीं हुए और तब तक युद्ध जारी रखने की बात कही जब तक जम्मू-कश्मीर का ये हिस्सा भारत को वापस नहीं मिल जाता।

सरदार पटेल के मना करने के बाद पाकिस्तान सरकार ने अमेरिका की मदद से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु से युद्ध विराम (Cease Fire) का अनुरोध किया, जिस पर नेहरु तैयार हो गए और शान्ति विराम की संधि हुई। नेहरु ने युद्ध विराम की घोषणा ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से रेडियो पर कर दी और ये भी कह दिया कि कश्मीर को हम एक विवादित क्षेत्र मानते है और इसका फैसला संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता में किया जाएगा। किन्तु युद्ध विराम का नियम है कि युद्ध विराम का फैसला केबिनेट की मीटिंग बुलाकर किया जाता है पर नेहरु ने अकेले ही ये घोषणा कर दी। जब महाराजा हरि सिंह ने समझौते पर दस्तखत कर दिए थे तो नेहरु को ये घोषणा करने की क्या जरूरत थी? 
सरदार पटेल शुरू से ही इस संधि के विरोध में थे और नेहरु इसके पक्षधर थे। संधि हस्ताक्षर होने के बाद कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्ज़े में आ गया जिसे हम आज पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं।

 

~ कुलदीप शर्मा 
 

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